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Wednesday, 11 February 2015

साया -1

चाय में शक्कर एक चम्मच लूँ या दो,
तुम अब उसके लिए मुझे टोकती नहीं।
शाम को जरा सी भी देर हो जाने पर,
तुम्हारी वो नाराज़गी गुमशुदा  सी है।।

            मिलते हैं अक्सर घर के दरवाज़े बंद ही,
            शाम को लौटने पर।
            बड़े जतन से ढूंढ के चाबी,
            उसी पुराने भूरे बैग से;
            जब खोलता हूँ दरवाज़े,
            तो मायूसी ही पसरी मालूम होती है।

सब कुछ वैसे ही, जैसे सुबह था,
या पिछली शाम,या पिछले दिनों।।
 
           पिछले दिनों जो पौधे तुमने,
           रोपे  थे बागीचे में,
           आकर देखो
           उन पर अब फूल खिले हैं ढेरों,
           पर बागीचे में नहीं,
           दूर तुम्हारी कब्र पर।।




Note; साया -1  is first in the series of  "साया " which I am planning to write in coming months. Your comments will inspire me beyond limits.

Saturday, 8 November 2014

चिनार की सूखी पत्तियाँ.....




मेरी किताबों के बीच रखी हुई
चिनार की सूखी पत्तियाँ
मुझे उन दिनों की याद दिलाती हैं;
जब वो हरी थीं और मैंने
ताजा-ताजा उन्हें रखा था।।
   
      जिन दिनों वो पेड़ पर थीं, खिलखिलाती थीं
      बदलती थीं रंग मौसम के साथ;
      और हर एक दिन बदलती हुई
      कुछ और बढ़ती, कुछ और रंगती,
      अपने बचपन से यौवन के बीच।।

अब वो यहीं रहती हैं
किताब के पन्नो की तहों के बीच;
मैंने देखा है कि
हवा के झोंके उनको हिलाते नहीं
अब बारिश की बूंदें उनको भिगाती नहीं
मानों इन सब से हो गयी हों बेअसर तब से
जब से मेरा दामन थामा है।

        अब वो सूख गयी हैं
        उनमे वो चमक, वो मुलायम एहसास नहीं।
        मानों रूखी हो गयी हों
        और नीरस भी; मेरी तरह ।।

उन्हें अब यहीं रहना पसन्द है
इन किताबों के पन्नों की तहों  के बीच
बेपरवाह बाहर होने वाली बातों से;
समाजों से, रीति - रिवाज़ों से;
मेरी तरह ।।

       ये सूखी भूरे रंग की पत्तियाँ,
       मुझे अक्सर ही याद दिलाती हैं,
       उन दिनों की,
       जब वो हरी थीं, और मैंने;
       ताजा-ताजा उन्हें रखा था ।।
   


Tuesday, 13 May 2014

क्या लिखूँ .

एक बंद पुराने कमरे में,
लिखने की कुछ कोशिश में,
एक कागज और एक कलम,
सोच में इस क्या लिखें हम।।
   
   
         गीत लिखूँ, संगीत लिखूँ
         या तेरी मेरी प्रीत लिखूँ,
         हार लिखूँ और जीत लिखूँ
        या गंगा का संध्या-दीप लिखूँ।।
        देस लिखूँ , परदेस लिखूँ ,
         तुमको जो भेजे संदेस लिखूँ।।


आँखों से जो होती बातें,
बीते सावन की  बरसातें
तन्हाई मे बीती रातें;
या लिखूँ  कोई एक कहानी
जो तुम्हे सुनाये दादी-नानी
नयी लिखूँ या  लिखूँ  पुरानी।।


                 लिखना चाहूँ हर दिन कुछ-कुछ
                  जो सबके मन को भाये,
                   ओठ  हो पुलकित, मन हर्षाये
                    भटके को रास्ता दिखलाये।।


एक बंद पुराने कमरे में,
लिखने की कुछ कोशिश में।।




Friday, 7 February 2014

याद कभी तो करते होंगे..

याद कभी तो करते होंगे
चुभती सी तन्हाई में,
या कागज और स्याही में,
या मौसम कि पहली बारिश में,
मुझे पता है;
याद कभी तो करते होंगे।।


                ये पिछले जनम की तो बात नहीं,
                 भूल गए वो बातें सारी,
                 ऐसा मुझको विश्वास नहीं;
                  रह-रहकर आईने से,
                  बात कभी तो करते होंगे,
                   मुझे पता है;
                   याद कभी तो करते होंगे।।


वो कहते हैं उस बगिया में,
अब कोई पहरेदार नहीं,
वो कहते हैं उस बग़िया में,
होती अब बरसात नहीं,
मैं कहता हूँ उस बगिया में,
फूल अभी तक  खिलते होंगे
मुझे पता है;
याद कभी तो करते होंगे।।


                  तन्हा  रस्तों  पर चल ना पाओगे,
                  ऐसी तो कोई बात नहीं।
                  गिरे अगर उठ न पाओगे,
                  ऐसी भी कोई बात नहीं
                   पर फिर भी.… मिल जाएँ  एक मोड़ पर यूँ ही,
                   फ़रियाद कभी तो करते होंगे,
                    मुझे पता है;
                    याद कभी तो करते होंगे।।

Thursday, 5 December 2013

पुराने पन्नों से …

ये पंक्तियाँ मैंने दो साल पहले लिखी थी, आज यूँ ही पन्ने  पलटते हुए इस पर मेरी नजर पड़ी तो सोचा शेयर करूँ आप सब के साथ। आखिरी  चार पंक्तियाँ कल ही जोड़ी। इसीलिए इसका शीर्षक " पुराने पन्नों  से " दिया।



यूँ तो चांदनी अपना दामन समेट ही चुकी है,
पर सवेरा होना अभी बाकी  है।
कुछ पायदान ऊपर चढ़ी है जिन्दगी
कामयाबी का सुरूर अभी बाकी है।।



  
           ओझिल होते हुए सपनों  की  किताब से
           एक पन्ना चुरा लिया है हमने,
           रंगो से भरे कल कि तस्वीर देखी है हमने,
            तस्वीर को हकीकत बनाना अभी बाकी  है।।


इन पथरायी आँखों ने खो दिया है
सारा यौवन उनके इंतजार  में
कल शाम ढले एक पैगाम तो आया था;
पर उनका आना अभी बाकी  है।।


          मुमकिन है कि ढूँढ ही लेंगे एक नया जहाँ,
          कि पंखों में उड़ान अभी बाकी  है।
          बर्फ से टूटती हुई नदी को,
           साहिल कि तलाश अभी बाकी है।।




Thursday, 17 October 2013

फर्क नहीं पड़ता...

जब चार बरस का दीपू कोई,
ढाबे पर बर्तन धोता है
जब सड़क किनारे मुन्ना कोई
भूख के मारे रोता है:
तब मैं कहता हूँ यारों कि
मुझको फर्क नहीं पड़ता ll
     
        भारत माँ का लाल कोई जब 
        सीमा पर अपनी जान गँवाए,
        पानी के बँटवारे को लेकर जब
        खेत किसी का जुत ना पाए
        मैं उदासीन, मैं व्यसनलीन
        मुझको फर्क नहीं पड़ता ll




भ्रष्ट तंत्र व भ्रष्ट सरकार
नित ही होते बलात्कार
मानवता है शर्मसार;
कौन करे इसका उद्धार
तब भी मैं ये ही कहता हूँ
मुझको फर्क नहीं पड़ता ll 


     देश को अच्छा नेता चाहिए
     यह कहने तक बस मेरी हिस्सेदारी,
     बाकि सब उनकी जिम्मेदारी
     देश पर क्यूँ न आफत टूटे,
     पर मेरी सुख-सुविधा न छूटे
     मैं अपनी मस्ती में रहता हूँ
     मुझको फर्क नहीं पड़ता ll 

जब नेटवर्क में अड़चन आये
ट्विटर, फेसबुक खुल ना पाए
आँधी और बारिश के कारण
चंद मिनट बिजली ना आये
तब यारों मुश्किल है कहना कि
मुझको फर्क नहीं पड़ता ll  

Tuesday, 12 March 2013

दूसरी दुनिया में अपने ....

इंसानों की इस दुनिया में,
कुछ लोग आपके बेहद
करीब होते हैं  l
पर अचानक हो जाते हैं
शुन्य में विलीन कहीं;
बिना बताये, चुपके से
जैसे की कभी थे ही नहीं l l

         धीरे - धीरे भर जाते हैं आपके घाव,
         और उनकी यादें भी धुंधलाने लगती हैं l
         पर वो नहीं भूलते आपको,
         शामिल हैं वो आपकी खुशियों में,
         और दुःख में भी l

दिन और रात देखते हैं आपको
कठिनाइयों से जूझते हुए,
सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ते हुए;
करते हैं वो सिफारिश ऊपर वाले से,
आपकी खुशियों के लिए।
     
         निगरानी है उनकी आपकी हर हरकत पर,
         अच्छी और बुरी दोनों ही।
         आपका पथ प्रकाशित करें वो लोग
         जो इंसानों की इस दुनिया में;
          कभी आपके बेहद करीब होते हैं।।
                                                      -दादा जी को समर्पित
                                 

Monday, 31 December 2012

श्रद्धांजलि.........

तेरह दिन की गहरी धुंध,
और अगली सुबह,
जैसे सुबह ही नहीं हुई।
चारों  ओर  तम का साया
हे ईश! नहीं कहीं तेरी छाया।।
       
          जीवन हार गया है आज,
          विद्रोह- पूरित सम्पूर्ण समाज।
          अब जीवित केवल निराशा,
          और चुभन लाचारी की;
          यही कहानी शेष बची अब,
          हिन्दुस्तान की नारी की।।

कैसा है ये अंतर्द्वंद,
क्रोधाग्नि अब क्यूँ रहे मंद।
मानव को मानव बनना होगा।
क्रोधाग्नि में जलना होगा,
अग्नि-परीक्षा तय कर ही इसको,
तपकर सोना बनना होगा।।

Tuesday, 6 November 2012

आखिरी पर्वत से आगे .......

जिन आँखों में जगे हों सपने,
उन आँखों में नींद कहाँ?
जब दीप जले हों रातों में,
तब अंधियारे के तीर कहाँ?
     
         बढ़ेंगे पग तो राह बनेगी,
         उम्मीदों की धूप खिलेगी l
         जब निर्भय और संकल्प से यारी,
         तब फिर मन भयभीत कहाँ?

पथ में कितने साथी छूटे;
पर तेरा न साहस टूटे,
निर्भर केवल जब स्वयं के श्रम पर,
तब रिश्ते-नाते, मीत कहाँ?

       हर एक हार संकल्प बढ़ाये,
        हर एक जीत आगे ले जाए;
        धैर्य नियंत्रित, पथ संकल्पित
        अब मंजिल मेरी दूर कहाँ?

जब दीप जले हों रातों में,
तो अंधियारे के तीर कहाँ?


Wednesday, 19 September 2012

वो शाम

ये जानते हुए भी कि
न लौट के आओगे तुम कभी
वो शाम ठहर के वहीँ;
तेरा इंतज़ार करती है l
  

               अहसास होते हुए भी ये
               कि निकल गया तू बहुत दूर कहीं
               तब भी मेरी नजरें क्यूँ हर पल;
                तेरा दीदार करती हैं l

ये जानते हुए भी कि
फर्क तुझमें और मुझमे ऐसे
जैसे धरती और अम्बर में,
फिर भी मुझसे दुनिया ये अक्सर;
जिक्र तेरा ही करती है l

             बरस दर बरस बीत गए
             लेकिन मैं रह गया पीछे कहीं
             उसी रात पर;
             वो रात ठहर के वहीँ
             तुझी से बात करती है l
             वो शाम ठहर  के वहीँ
             तेरा इंतज़ार करती है l


        

Monday, 16 July 2012

कल रात तुझे सपने में देखा

कल रात तुझे सपने में देखा,
चाँद जमीं पर चलते देखा l
स्वर्ग लगे है कितना सुन्दर,
आज यहीं धरती पर देखा ll 
                 
                     तुम हँस दो तो जीवन चलता,
                      तुम गाओ तो बहती पवनें,
                      कैसे अंकुर वृक्ष है बनता,
                       नभ से जीवन झरते देखा ll


तुमको पाना ध्येय यही अब,
राह तू ही मंजिल तू ही अब l
नित-नित अपने सपनों को,
नयी चुनौती पढ़ते देखा ll 
                 
                         धर्म-ग्रन्थ का तू ही सार,
                          तू सावन तू ही आषाढ़ l
                          पल-पल तेरी यादों में,
                          मैंने स्वयं को जलते देखा ll

कल रात तुझे सपने में देखा,
चाँद जमीं पर चलते देखा ll

                     

Monday, 11 June 2012

देखो सूरज डूब रहा है.........

देखो सूरज डूब रहा है,
एक और दिन बीत रहा हैl
कोई पूछे मदिरालय का पथ,
कोई साकी का डेरा,
कोई अलग नहीं यहाँ पर;
सबका जीवन गहन अँधेराl
पथिक का धीरज टूट रहा है,
देखो सूरज डूब रहा हैll

             वो कहते हैं नित की भाँति,
             पुनः सवेरा आएगाl
             पर मुझको भय है इस जग में बस,
             अँधियारा ही रह जायेगा;
              बस  अँधियारा ही रह जायेगाll
              एकाकी जीवन में जोगी,
               सन्नाटा अब  गूँज रहा है,
                देखो  सूरज डूब रहा हैll
             
यूँ तो जग ने अविरत समझाया,
पर मुझको अँधियारा ही भायाl
 ह्रदय-वेदना सहकर बोलो;
किसने है उजियारा अपनाया?
किसने है उजियारा अपनाया?
क्षण-क्षण रैना बढ़ने पर,
स्वप्न-महल अब टूट रहा है;
देखो सूरज डूब रहा हैll


Monday, 14 May 2012

देख पिया फागुन आया....

यूँ तो घर की ड्योढ़ी पर,
बखत बे बखत अक्सर ही,
वो उसका रस्ता तकती है,
ना जाने फागुन के आते ही;
वो थोडा खिल सी  जाती है ll

              वो चिट्ठी फिर से पढ़ती है,
              लिखा था जिसमे उसने की,
              मैं लौटूंगा फागुन में,
              हवा से पूछती है वो,
              कि उसका पिया कहाँ पे हैll



वो सजती है, संवरती है,
खुदी से बातें करती है,
फागुन का हर एक दिन वो 
गिन - गिन के बिताती है ll

                फागुन जब ढलने लगता है,
                तो वो भी ढलने लगती है,
                मगर फिर भी हर एक दिन वो 
                खुद को ये समझाती  है;
                कि लिखा था ख़त में उसने ये,
                कि लौटूंगा मैं फागुन मे ll 

फागुन यूँ बीत जाता है,
वो कुछ-कुछ टूट जाती है, 
यादों में पिछले फागुन की वो;
वो फिर से डूब जाती हैll

कहीं भूल न जाऊँ पथ घर का.......


                          वैदेही वनवास से,
                          विघटित होती आस से,
                          ओझिल होते सपनो से,
                           दूर हुए उन अपनों से,
                           किंकर्तव्यविमूढ़ होते हैं;
                            जब आप घर से दूर होते हैंll
                                   
                                             बुझती आशा, छिपता सूरज,
                                              मंदिर में वो राम की मूरत,
                                              वो नेजे और गुदरी के मेले,
                                              वो कुल्फी और चाट के ठेले,
                                              बड़े सरल पर गूढ़ होते हैं;
                                              जब आप घर से दूर होते हैं ll
                     
                           आँख भरी और दिल है तन्हाँ,
                           सुख वैभव का क्या है करना,
                           दूर रहे जब जीवन अपना,
                           घर संसार लगे एक सपना,
                           क्या अपनों के बिना कभी सम्पूर्ण होते हैं;
                           जब आप घर से दूर होते हैं ll