Wednesday, 19 September 2012

वो शाम

ये जानते हुए भी कि
न लौट के आओगे तुम कभी
वो शाम ठहर के वहीँ;
तेरा इंतज़ार करती है l
  

               अहसास होते हुए भी ये
               कि निकल गया तू बहुत दूर कहीं
               तब भी मेरी नजरें क्यूँ हर पल;
                तेरा दीदार करती हैं l

ये जानते हुए भी कि
फर्क तुझमें और मुझमे ऐसे
जैसे धरती और अम्बर में,
फिर भी मुझसे दुनिया ये अक्सर;
जिक्र तेरा ही करती है l

             बरस दर बरस बीत गए
             लेकिन मैं रह गया पीछे कहीं
             उसी रात पर;
             वो रात ठहर के वहीँ
             तुझी से बात करती है l
             वो शाम ठहर  के वहीँ
             तेरा इंतज़ार करती है l


        

4 comments:

  1. वो रात ठहर के वहीँ
    तुझी से बात करती है .... I can see different tastes in ur poems :)

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  2. सुन्दर ,सरल और प्रभाबशाली रचना। बधाई।
    कभी यहाँ भी पधारें।
    सादर मदन
    http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

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  3. awesomeeeeeeeeeeeeeeee......!!!

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