Monday, 31 December 2012

श्रद्धांजलि.........

तेरह दिन की गहरी धुंध,
और अगली सुबह,
जैसे सुबह ही नहीं हुई।
चारों  ओर  तम का साया
हे ईश! नहीं कहीं तेरी छाया।।
       
          जीवन हार गया है आज,
          विद्रोह- पूरित सम्पूर्ण समाज।
          अब जीवित केवल निराशा,
          और चुभन लाचारी की;
          यही कहानी शेष बची अब,
          हिन्दुस्तान की नारी की।।

कैसा है ये अंतर्द्वंद,
क्रोधाग्नि अब क्यूँ रहे मंद।
मानव को मानव बनना होगा।
क्रोधाग्नि में जलना होगा,
अग्नि-परीक्षा तय कर ही इसको,
तपकर सोना बनना होगा।।

7 comments:

  1. Women have no hope for safety in the country now. अब जीवित केवल निराशा,
    और चुभन लाचारी की;
    यही कहानी शेष बची अब,
    हिन्दुस्तान की नारी की।।

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  2. ultimate broo!!!!!!
    GoD bless u !!!!

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  3. उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  4. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति,,,,

    Recent post: रंग,

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  5. सम सामायिक रचना..

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  6. सुन्दर प्रस्तुति .बहुत खूब,

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